Monday, May 22

मुगलो के इस सबसे बड़े दुश्मन को सम्मानित करेंगे मोदी।

सिख योद्धा बाबा बंदा सिंह बहादुर के 300वें शहीदी दिवस के अवसर पर आज (रविवार) दिल्ली में आयोजित हो रहे कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हिस्सा लेंगे।बाबा बंदा सिंह बहादुर पर जारी सिक्के पीएम मोदी और पंजाब के सीएम को भेंट किये जाएंगे।

इस अवसर पर पीएम बाबा बंदा सिंह बहादुर जी पर एक किताब और स्मारिका रिलीज करेंगे। साथ पीएम कार्यक्रम में उपस्थित लोगों को संबोधित भी करेंगे। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बाबा बंदा सिंह बहादुर के 300वां शहीदी दिवस को यादगार बनाने लिए 21 जून को चांदी का सिक्का जारी किया था।

कौन थे बंदा सिंह बहादुर  ?

बाबा बन्दा सिंह बहादुर का जन्म कश्मीर स्थित पुंछ जिले के राजौरी क्षेत्र में 1670 ई. तदनुसार विक्रम संवत् 1727, कार्तिक शुक्ल 13 को हुआ था। वह राजपूतों के भारद्वाज गोत्र से सम्बद्ध था और उसका वास्तविक नाम लक्ष्मणदेव था।5 वर्ष की उम्र में वह जानकीप्रसाद नाम के एक बैरागी का शिष्य हो गया और उसका नाम माधोदास पड़ा। तदन्तर उसने एक अन्य बाबा रामदास बैरागी का शिष्यत्व ग्रहण किया और कुछ समय तक पंचवटी (नासिक) में रहा। वहाँ एक औघड़नाथ से योग की शिक्षा प्राप्त कर वह पूर्व की ओर दक्षिण के नान्देड क्षेत्र को चला गया जहाँ गोदावरी के तट पर उसने एक आश्रम की स्थापना की।

गुरु गोबिन्द सिंह से प्रेरणा

3 सितंबर 1708 ई. को नान्देड में सिक्खों के दसवें गुरु गुरु गोबिन्द सिंह ने इस आश्रम को देखा और उसे सिक्ख बनाकर उसका नाम बन्दासिंह रख दिया। पंजाब में सिक्खों की दारुण यातना तथा गुरु गोबिन्द सिंह के सात और नौ वर्ष के शिशुओं की नृशंस हत्या ने उसे अत्यन्त विचलित कर दिया। गुरु गोबिन्द सिंह के आदेश से ही वह पंजाब आया और सिक्खों के सहयोग से मुगल अधिकारियों को पराजित करने में सफल हुआ। मई, 1710 में उसने सरहिंद को जीत लिया और सतलुज नदी के दक्षिण में सिक्ख राज्य की स्थापना की। उसने खालसा के नाम से शासन भी किया और गुरुओं के नाम के सिक्के चलवाये।

मुघलो ने कर दिए थे शरीर के टुकड़े टुकड़े

1715 ई. के प्रारम्भ में बादशाह फर्रुखसियर की शाही फौज ने अब्दुल समद खाँ के नेतृत्व में उसे गुरुदासपुर जिले के धारीवाल क्षेत्र के निकट गुरुदास नंगल गाँव में कई मास तक घेरे रखा। खाद्य सामग्री के अभाव के कारण उसने 7 दिसम्बर को आत्मसमर्पण कर दिया। फरवरी 1716 को 794 सिक्खों के साथ वह दिल्ली लाया गया जहाँ 5 मार्च से 13 मार्च तक प्रति दिन 100 की संख्या में सिक्खों को फाँसी दी गयी। 16 जून को बादशाह फर्रुखसियर के आदेश से बन्दा सिंह तथा उसके मुख्य सैन्य-अधिकारियों के शरीर काटकर टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये।

loading...
Loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *