Tuesday, February 21

नए सेना प्रमुख के कारनामों को जानने के बाद नियुक्ति पर सवाल उठाने वालों का मुंह बंद हो जाएगा…

लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत को थल सेना का प्रमुख नियुक्त किया गया है. मालुम हो कि ले. जनरल विपिन रावत जल्द ही जनरल दलबीर सिंह सुहाग का जगह लेते हुए भारतीय थल सेना की कमान संभालेंगे. ख़बरों के मुताबिक उन्हें सीनियर आर्मी कमांडर ले. जनरल प्रवीण बख्शी को नजर अंदाज करते हुए यह अहम जिम्मेदारी दी गई है.

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कैसे होता है सेना प्रमुख के चयन?

नियम के मुताबिक लेफ्टिनेंट जनरल को (कमीशंड सेवा में 36 साल तक रहने के बाद) चुना जाता है आगे चल कर वह वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ या आर्मी कमांडर्स का पद भी संभाल सकते है. इसके बाद लेफ्टिनेंट जनरल प्रमोट हो कर जनरल बनते हैं और उन्हें ही सेना प्रमुख चुना जाता है. आमतौर पर सेना प्रमुख का चयन सीनियरिटी के आधार पर किया जाता है. लेकिन भारत के इतिहास में ऐसा कई बार हो चूका है जब सीनियर को दरकिनार कर क़ाबलियत के आधार पर जूनियर्स को ये कमान संभालने का मौका दिया गया है.

 

ले. जनरल बिपिन रावत का जन्म उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में हुआ. ले. ज. रावत इस पद पर पहुंचने वाले उत्तराखंड के पहले अधिकारी है. जनरल रावत शिमला के सेंट एडवर्ड स्कूल के पूर्व छात्र रह चुके हैं. वर्ष 1978 में इंडियन मिलिट्री एकेडमी देहरादून से पास आउट होने के बाद उन्हें 11वीं गोरखा राइफल्स की पांचवीं बटालियन में कमीशन मिला.

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जनरल रावत का करियर उपलब्धियों से भरा रहा है. वह दिसंबर 1978 में भारतीय सैन्य अकादमी से पासआउट होने वाले बैच के श्रेष्ठतम कैडेट रहे और उन्हें स्वार्ड ऑफ ऑनर मिला. लेफ्टिनेंट जनरल विपिन रावत अति विशिष्ट सेवा मेडल, युद्ध सेवा मेडल, सेना मेडल व विशिष्ट सेवा मेडल जैसे कई सम्मान से अलंकृत किए गए हैं.

अपनी पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए लेफ्टिनेंट जनरल विपिन रावत इस पद पर पहुंचे हैं. इससे पहले उनके पिता लेफ्टिनेंट जनरल लक्ष्मण सिंह रावत सेना में डिप्टी चीफ के पद से रिटायर हुए थे. उनके पिता भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून के कमांडेंट भी रह चुके हैं. वहीं जनरल रावत ने सहसेनाध्यक्ष का पद संभालने से पहले सेना की दक्षिणी कमान के कमांडर का पद भी संभाल चुके हैं.

कांगो में मल्टीनेशन ब्रिगेड की कमान संभालने के साथ ही वह यूएन मिशन में सेक्रेटरी जनरल व फोर्स कमांडर भी रह चुके हैं. सेना में कई अहम पद संभालने के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा पर उनके लेख विभिन्न जर्नल्स में प्रकाशित हो चुके हैं. मिलिट्री मीडिया स्ट्रैटिजिक स्टडीज पर शोध के लिए उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि भी मिल चुकी है. इन उपलब्धियों को देखते हुए ले. ज. रावत को सेना प्रमुख का कमान थमाया गया है.

 

भारत के इतिहास में ये पहली नही है जब सीनियरिटी को नजरंदाज कर के क़ाबलियत को मौका दिया गया है. सेना में किसी वरिष्ठ अधिकारी को नजरअंदाज कर जूनियर को सेना प्रमुख का कमान सौंपे जाने का यह पहला उदाहरण नहीं है. इससे पहले 1972 में इंदिरा गांधी सरकार ने खासे लोकप्रिय रहे लेफ्टिनेंट जनरल पीएस भगत को नजरअंदाज कर दिया था.

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दूसरे विश्व युद्ध के लिए विक्टोरिया क्रॉस अवॉर्ड जीत चुके भगत के बारे में माना जा रहा था कि वह सैम मानेकशॉ के उत्तराधिकारी हो सकते हैं। इंदिरा सरकार ने उन्हें नजरअंदाज करते हुए जी.जी. बेवूर को यह अहम जिम्मेदारी सौंपी थी. बेवूर भगत के जूनियर थे. उनके कार्यकाल के दौरान ही भगत रिटायर हो गए थे.

ऐसा ही दूसरा मामला 1983 में सामने आया था. जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लेफ्टिनेंट जनरल एसके सिन्हा को ले. जनरल ए. एस वैद्य को तवज्जो देते हुए सेना प्रमुख की जिम्मेदारी सौंप दी थी. ये भी कहा जा रहा है कि इससे नाराज होकर सिन्हा ने इस्तीफा सौंप दिया था.

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