Monday, May 22

जिस फरसे से हुआ था 21 बार पृथ्वी के सारे क्षत्रियों का नाश, वो मिला इस राज्य में..

झारखंड के टांगीनाथ नामक जगह पर आज भी मौजूद है भगवान परशुराम का फरसा

भारत चमत्कारों से भरा हुआ देश है यहां हर जगह आपको कुछ ना कुछ इतिहास से जुड़ी चमत्कारिक चीजें दिखाई दे ही जाती हैंl संस्कृति से भरे हुए इस देश में बहुत सी ऐसी घटनाऐं भी सामने आती रहती हैं जिसका पुराणों में उल्लेख हैl आज हम आपको एक ऐसे धाम से रूबरू कराने वालें हैं जो भारत के झारखंड राज्य में स्थित है और यहां आज भी भगवान परशुराम का फरसा रखा है जिसके बारे में पुराणों में लिखा हैं कि उस फरसे से उन्होंने 21 बार पृथ्वी से सारे क्षत्रियों का नाश किया थाl

झारखंड राज्य मे गुमला शहर से करीब 75 km दूर तथा रांची से करीब 150km दूर घने जंगलों के बीच स्थित है टांगीनाथ नामक एक धामl यहाँ आने के बाद आप आज भी भगवान परशुराम का फरसा ज़मीं मे गड़ा हुआ देख सकतें हैंl आपको बता दें कि झारखंड में फरसा को टांगी कहा जाता है, इसलिए इस स्थान का नाम टांगीनाथ धाम पड़ गयाl धाम में आज भी भगवान परशुराम के पद चिह्न मौजूद हैंl

पुराणों में लिखे एक उल्लेख के अनुसार भगवान परशुराम ने इसी जगह अपनी एक गलती को सुधारने के लिए पश्चाताप किया थाl

कहा जाता है कि टांगीनाथ धाम मे भगवान विष्णु के छठवें अवतार परशुराम ने तपस्या कि थीl परशुराम के टांगीनाथ पहुँचने के पीछे भी एक कथा है कि जब राम, राजा जनक द्वारा सीता के लिये आयोजित स्वयंवर मे भगवान शिव का धनुष तोड़ देते है तो परशुराम बहुत क्रोधित होते हुए वहा पहुँचते है और श्रीराम को शिवजी  का धनुष तोड़ने के लिए भला–बुरा कहते हुए उनकी आलोचना करते हैंl

परशुराम की सारी आलोचनाओं के बाद भी राम मौन रहते है, जिसे देखकर लक्ष्मण को क्रोध आ जाता है और वो परशुराम से बहस करने लग जाते हैंl इसी बहस के दौरान जब परशुराम को यह ज्ञात होता है कि राम भी भगवान विष्णु के ही अवतार है तो वो बहुत लज्जित होते है और वहाँ से निकलकर पश्चाताप करने के लिये घने जंगलों के बीच आ जाते हैl घने जंगलों के बीच वे शिवलिंग की स्थापना करके और अपने बगल मे ही अपना फरसा गाड़ कर तपस्या करते हैl  इसी जगह को आज सभी टांगीनाथ धाम से जानते हैंl

यहाँ पर गड़े लोहे के फरसे की जहां एक अद्भुत विशेषता यह है कि हज़ारों सालों से खुले मे रहने के बावजूद इस फरसे पर ज़ंग नही लगी है तो वहीं दूसरी विशेषता यह है कि ये जमीन मे कितना नीचे तक गड़ा है इसकी भी कोई जानकारी अब तक नही लग पाई हैl हालांकि एक अनुमान 17 फ़ीट का बताया जाता हैl 

कहा जाता है कि एक बार क्षेत्र मे रहने वाली लोहार जाति के कुछ लोगो ने लोहा प्राप्त करने के लिए फरसे को काटने का प्रयास भी किया थाl वो लोग फरसे को तो नही काट पाये लेकिन उनकी पूरी जाति के लोगो को इस दुस्साहस की भारी कीमत चुकानी पड़ी और जिसके परिणामस्वरूप उन लोगों की अपने आप अचानक मौत होने लगीl इसी डर के चलते पूरी लोहार जाति ने वो क्षेत्र छोड़ दिया और आज भी धाम से 15 km के दायरे  में लोहार जाति के लोग नही बसते हैl

जहां कुछ लोग इस फरसे को भगवान परशुराम से जोड़कर देखते हैं तो वहीं कुछ लोग टांगीनाथ धाम मे गड़े फरसे को भगवान शिव का त्रिशुल बताते हुए इसका सम्बन्ध शिवजी से भी जोड़ते हैl

भगवान शिव से जोड़ते हुए लोग पुराणों की एक कथा का भी उल्लेख करते है जिसके अनुसार एक बार भगवान शिव किसी बात से शनि देव पर क्रोधित हो जाते है और गुस्से में वो अपने त्रिशूल से शनि देव पर प्रहार कर देते हैंl शनि देव त्रिशूल के प्रहार से किसी तरह अपने आप को बचा लेते है लेकिन शिवजी का फेका हुआ त्रिशुल एक पर्वत की चोटी पर जा कर धस जाता हैl वह धसा हुआ त्रिशुल आज भी यथावत वही पडा हैl क्योंकि टांगीनाथ धाम मे गड़े हुए फरसे की ऊपरी आकृति कुछ-कुछ त्रिशूल से मिलती है इसलिए लोग इसे शिव जी का त्रिशुल भी मानते हैl

पुरातत्व विभाग द्वारा टांगीनाथ धाम में जब कुछ साल पहले खुदाई की गई थी तो वहां से जो कुछ निकला उसने लोगों के होश उड़ा दिएl

टांगीनाथ धाम में हुई थी खुदाई, निकले थे प्राचीन सोने और चांदी के बहुमूल्य आभूषण

आपको बता दें कि 1989 में पुरातत्व विभाग ने टांगीनाथ धाम मे खुदाई की थीl खुदाई में उन्हें सोने चांदी के आभूषण सहित अनेक मूल्यवान वस्तुए मिली थी, लेकिन कुछ कारणों से यहां पर खुदाई बन्द कर दी गई और फिर कभी यहां पर खुदाई नही की गईl खुदाई में हीरा जडि़त मुकुट, चांदी का अर्धगोलाकार सिक्का, सोने का कड़ा, कान की सोने की बाली, तांबे की बनी टिफिन जिसमें काला तिल व चावल रखा था, आदि चीजें मिलीं थींl यह सब चीज़े आज भी डुमरी थाना के मालखाना में रखी हुई हैl

टांगीनाथ धाम के विशाल क्षेत्र मे फैले हुए अनगिनत अवशेष यह बताने के लिए पर्याप्त है कि यह क्षेत्र किसी जमाने मे हिन्दुओं का एक प्रमुख तीर्थ स्थल रहा होगा लेकिन किसी अज्ञात कारणों से यह क्षेत्र खंडहर मे तब्दील हो गया और भक्तों का यहां पहुचना कम हो गयाl
नक्सलवाद के चलते और ऊपर से सरकार के लचर रवैये ने भी इस धाम को कोई महत्व नहीं दिया जिस कारण लोगों को इसके बारें में पता ही नहीं चला हैl हो सकता है कि सरकार शायद इस पर कुछ काम करे और इसे दुबारा सही से खोला जायेl
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